हेलो फ्रेन्डस,
हमारा देश खेती प्रधान देश है. ओर शायद यही हमारी सबसे बडी ताकत है. यही ताकत का सही इस्तेमाल करके हमारा देश ओर भी financial strong बन सकते है. लेकीन हालात बिलकुल उल्टे है, हम industrialization की तरफ बिना limit के भाग रहे है. ओर देश का किसान या तो आत्महत्या कर रहा है,या फिर उसी industrialization को अपनी जमिन बेच रहा है. बाहरी देश कि कंपनिया यहा industrialization बढा के सारा पैसा अपने देश लेके जाती है.
हमारे खेती प्रधान देश मे दाल 80 से 90 रूपये के भाव मिलती है. ओर हर साल लाखो टन दाल बाहरी देश से मंगाई जाती है. आॅस्टोलिया, कॅनडा जैसे प्रगत देश ओर आफ्रीका के अप्रगत देश हमको दाल सप्लाय करते है. जैसे इन देशों कि दाल की खेती बनी ही है हमारे देश को दाल सप्लाय करने को. हमारे देश मे 60% जनता खेती करती है,फिर भी हमारी हालत इतनी गंभीर है. तो सोचिये कोई businessman इस खेती को business touch दे तो हमारे देश का कितना पैसा जो बाहर देश जाता है वो बच जायेगा.
खेती मे ज्यादा पैसा रासायनिक खाद पे जाता है. जितना पैसा रासायनिक खाद पे जाता है उसके हिसाब से मुनाफा कम होता है. ओर खेती का budget बढ जाता है.ओर ज़मीन की उपजाऊ क्षमता भी कम होती है. किसी भी buisiness मे success पाने के लिए उसका budget perfect होना चाहिए. इसलिए आज हम बात करेंगे ZERO BUDGET KHETI की. जिस मे आप सिर्फ इक गाय पालकर 30 एकड खेती कर सकते हो. जिसके founder है पद्मश्री पुरस्कार सन्मानित श्री. सुभाष पालेकर सर.
पद्मश्री श्री. सुभाष पालेकरजी का जनम महाराष्ट्र के अमरावती जिले के बेलोरा गाव मे हुआ. वो कृषी विज्ञान से graduate है. पहले दस साल उन्होने भी रासायनिक खेती की. पहले अच्छी खेती हुई लेकीन बाद उसमे घाटा होने लगा. इसका solution निकालने के लिए वो बडे बडे agreecultural officers को मिले लेकीन उनको कोई समाधान मिला नही. फिर उन्होने ठान लिया की वो खुद ही इसका solution निकाल लेंगे ओर इस प्रकार ZERO BUDGET KHETI का जनम हुआ.
बिजामृत, जिवामृत, अच्छादन और वाफसा ये चार बहोत ही महत्वपूर्ण सुत्र है ZERO BUDGET KHETI के. अपने खेती के संसाधनों को उपयोग मे लाना ये इसका मुलमंत्र है
बिजामृत - फसल पडनेवाले किडों तथा रोगों को ये नियंत्रीत करता है. देसी गाय का गोबर,गोमूत्र ओर चूना से ये बनाया जाता है.
जिवामृत - फसल की अच्छी पैदावार के लिए जिवामृत बहोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. देसी गाय का गोबर,चूना ओर गुढ से जिवामृत बनाया जाता है.
वाफसा- वाफसा माने भूमि में हर दो मिट्टी के कणों के बीच जो खाली जगह होती है, उन में पानी का अस्तित्व बिल्कुल नहीं होना चाहिए है, उन में हवा और वाष्प कणों का सम मात्रा में मिश्रण निर्माण होना चाहिए. वास्तव में भूमि में पानी नहीं, वाफसा चाहिए, याने हवा 50% और वाष्प 50% इन दोनों का समिश्रण चाहिए.आजकल पानी की कमी भी महसूस होती है. इस मे 90% पानी की बचत होती है.
आच्छादन - हम जब दो बैलों से खींचने वाले हल से जोताई करते हैं, तब भूमि पर मिट्टी का आच्छादन ही डालते हैं. जिस से भूमि की अंतर्गत नमी और उष्णता वातावरण में उड़कर नहीं जाती, बची रहती है.जब हम हमारी फ़सलों की कटाई के बाद दाने छोड़कर फ़सलों के जो अवशेष बचते हैं, वह अगर भूमि पर आच्छादन स्वरूप डालते हैं, तो अनंत कोटी जीवजंतु और केंचवे भूमि के अंदर बाहर लगातार चक्कर लगाकर चौबीस घंटे भूमि को बलवान,ओर समृद्ध बनाने का काम करते हैं और हमारी फ़सलों को बढ़ाते हैं. हम मिश्रित फसलें लेते हैं, उन्हें भी सजीव आच्छादान कहते हैं.
उन्होने palekarzerobudgetspiritualfarming इस वेब साइटपर पूरी जानकारी दी है.बहोत सारी किताबे भी लिखी है. spiritual याने आध्यात्म.आध्यात्म खेती जो की भगवान बनता है. जंगलों मे जो पेड़ पौधे होते है, उन्हे इंसान तो बनता नही तो कोंन बनता है. बिना कुछ किए वो कितना फलते फुलते ये कैसे होता है. उन्हे भगवान बनता है. वो कहते है ना की, भगवान के मर्जी के बिना पेड़ का पत्ता भी नही हिलता ओर उनका ये विचार बहोत सही है.
आज देश विदेश मे इस तंत्र से ये खेती की जा रही है. ये इक natural खेती है. इस से रासायनिक खेती से होनेवाले अनेक रोगों तथा बिमारीयों से भी बचा जा सकता है. Natural खेती से बनी चीज़ो के दाम भी अलग होते है, उन्हे स्पेशली खरीदनेवाले लोग भी होते है जो ज़्यादा भाव देके ये चीज़े खरीदते है.
मैने पहले भी ayurvedik खेती business पे एक पोस्ट लिखा था, वो इस तंत्र से की जा सकती है ओर जिन किसान भाइयो तक ये तंत्र ये ज्ञान अब तक पहुँचा नही उन तक भी ये पहुँचे ओर वे भी इसका लाभ उठाए ओर देश को ओर आर्थिक शक्तिशाली बनाए यही मेरा एक सतविचार है.
धन्यवाद.
हमारा देश खेती प्रधान देश है. ओर शायद यही हमारी सबसे बडी ताकत है. यही ताकत का सही इस्तेमाल करके हमारा देश ओर भी financial strong बन सकते है. लेकीन हालात बिलकुल उल्टे है, हम industrialization की तरफ बिना limit के भाग रहे है. ओर देश का किसान या तो आत्महत्या कर रहा है,या फिर उसी industrialization को अपनी जमिन बेच रहा है. बाहरी देश कि कंपनिया यहा industrialization बढा के सारा पैसा अपने देश लेके जाती है.
हमारे खेती प्रधान देश मे दाल 80 से 90 रूपये के भाव मिलती है. ओर हर साल लाखो टन दाल बाहरी देश से मंगाई जाती है. आॅस्टोलिया, कॅनडा जैसे प्रगत देश ओर आफ्रीका के अप्रगत देश हमको दाल सप्लाय करते है. जैसे इन देशों कि दाल की खेती बनी ही है हमारे देश को दाल सप्लाय करने को. हमारे देश मे 60% जनता खेती करती है,फिर भी हमारी हालत इतनी गंभीर है. तो सोचिये कोई businessman इस खेती को business touch दे तो हमारे देश का कितना पैसा जो बाहर देश जाता है वो बच जायेगा.
खेती मे ज्यादा पैसा रासायनिक खाद पे जाता है. जितना पैसा रासायनिक खाद पे जाता है उसके हिसाब से मुनाफा कम होता है. ओर खेती का budget बढ जाता है.ओर ज़मीन की उपजाऊ क्षमता भी कम होती है. किसी भी buisiness मे success पाने के लिए उसका budget perfect होना चाहिए. इसलिए आज हम बात करेंगे ZERO BUDGET KHETI की. जिस मे आप सिर्फ इक गाय पालकर 30 एकड खेती कर सकते हो. जिसके founder है पद्मश्री पुरस्कार सन्मानित श्री. सुभाष पालेकर सर.
पद्मश्री श्री. सुभाष पालेकरजी का जनम महाराष्ट्र के अमरावती जिले के बेलोरा गाव मे हुआ. वो कृषी विज्ञान से graduate है. पहले दस साल उन्होने भी रासायनिक खेती की. पहले अच्छी खेती हुई लेकीन बाद उसमे घाटा होने लगा. इसका solution निकालने के लिए वो बडे बडे agreecultural officers को मिले लेकीन उनको कोई समाधान मिला नही. फिर उन्होने ठान लिया की वो खुद ही इसका solution निकाल लेंगे ओर इस प्रकार ZERO BUDGET KHETI का जनम हुआ.
बिजामृत, जिवामृत, अच्छादन और वाफसा ये चार बहोत ही महत्वपूर्ण सुत्र है ZERO BUDGET KHETI के. अपने खेती के संसाधनों को उपयोग मे लाना ये इसका मुलमंत्र है
बिजामृत - फसल पडनेवाले किडों तथा रोगों को ये नियंत्रीत करता है. देसी गाय का गोबर,गोमूत्र ओर चूना से ये बनाया जाता है.
जिवामृत - फसल की अच्छी पैदावार के लिए जिवामृत बहोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. देसी गाय का गोबर,चूना ओर गुढ से जिवामृत बनाया जाता है.
वाफसा- वाफसा माने भूमि में हर दो मिट्टी के कणों के बीच जो खाली जगह होती है, उन में पानी का अस्तित्व बिल्कुल नहीं होना चाहिए है, उन में हवा और वाष्प कणों का सम मात्रा में मिश्रण निर्माण होना चाहिए. वास्तव में भूमि में पानी नहीं, वाफसा चाहिए, याने हवा 50% और वाष्प 50% इन दोनों का समिश्रण चाहिए.आजकल पानी की कमी भी महसूस होती है. इस मे 90% पानी की बचत होती है.
आच्छादन - हम जब दो बैलों से खींचने वाले हल से जोताई करते हैं, तब भूमि पर मिट्टी का आच्छादन ही डालते हैं. जिस से भूमि की अंतर्गत नमी और उष्णता वातावरण में उड़कर नहीं जाती, बची रहती है.जब हम हमारी फ़सलों की कटाई के बाद दाने छोड़कर फ़सलों के जो अवशेष बचते हैं, वह अगर भूमि पर आच्छादन स्वरूप डालते हैं, तो अनंत कोटी जीवजंतु और केंचवे भूमि के अंदर बाहर लगातार चक्कर लगाकर चौबीस घंटे भूमि को बलवान,ओर समृद्ध बनाने का काम करते हैं और हमारी फ़सलों को बढ़ाते हैं. हम मिश्रित फसलें लेते हैं, उन्हें भी सजीव आच्छादान कहते हैं.
उन्होने palekarzerobudgetspiritualfarming इस वेब साइटपर पूरी जानकारी दी है.बहोत सारी किताबे भी लिखी है. spiritual याने आध्यात्म.आध्यात्म खेती जो की भगवान बनता है. जंगलों मे जो पेड़ पौधे होते है, उन्हे इंसान तो बनता नही तो कोंन बनता है. बिना कुछ किए वो कितना फलते फुलते ये कैसे होता है. उन्हे भगवान बनता है. वो कहते है ना की, भगवान के मर्जी के बिना पेड़ का पत्ता भी नही हिलता ओर उनका ये विचार बहोत सही है.
आज देश विदेश मे इस तंत्र से ये खेती की जा रही है. ये इक natural खेती है. इस से रासायनिक खेती से होनेवाले अनेक रोगों तथा बिमारीयों से भी बचा जा सकता है. Natural खेती से बनी चीज़ो के दाम भी अलग होते है, उन्हे स्पेशली खरीदनेवाले लोग भी होते है जो ज़्यादा भाव देके ये चीज़े खरीदते है.
मैने पहले भी ayurvedik खेती business पे एक पोस्ट लिखा था, वो इस तंत्र से की जा सकती है ओर जिन किसान भाइयो तक ये तंत्र ये ज्ञान अब तक पहुँचा नही उन तक भी ये पहुँचे ओर वे भी इसका लाभ उठाए ओर देश को ओर आर्थिक शक्तिशाली बनाए यही मेरा एक सतविचार है.
धन्यवाद.

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