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Friday, 25 January 2019

January 25, 2019

Ramayana Story- Untold Story Of Ramayana For Life Changing


  हमारे धर्मग्रंथ Ramayana Story अपनी रोज के व्यवहारों के लिए बहोत ही मार्गदर्शक है. जो हमें जिवनमुल्य सिखाते है तथा अपने आचरण एवं विचारों को शुद्ध बनाते है. इस पोष्ट से हम इन्ही सब बातो का विवरण करेंगे. आज हम ऐसी ही इक Ramayana Story जानेंगे जो शायद आपने कभी पढी नही होगी.
    
   कोई भी चिज पाने के लिए पुण्य का होना जरूरी है. और पुण्य पाने के लिए सत् कर्म, सत् भगवत भक्ती और सत् विचारों की आवशक्ता है.
 Ramayana Story- Untold Story Of Ramayana For Life Changing

Ramayana Story - पुण्य का महत्व.


रावण सिताजी  को हमेशा पाना चाहता था. लेकिन रावण के उतने पुण्य नही थे कि वो सिताजी को पा सके. रावण बहोत शक्तीशाली तथा धनवान था. लेकिन पुण्य उसके पास बिलकुल भी नही था. लेकिन श्रीराम खुद पुण्य स्वरूप थे. जिनको देखने से ही पुण्य मिलता था. सिताजी भी श्रीराम कि भक्त थी.

    जब श्रीराम सिताजी को लाने अपने वानरसेना के साथ लंका गये. तो श्रीराम और रावन के बिच युद्ध चल रहा था. इधर आयोध्या में श्रीराम के वियोग से उनके पिता राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिये थे. क्रियाकर्म और अस्थी विसर्जन का कार्य सबसे बडे बेटे होने के कारण श्रीराम करे  ऐसे भरत और शत्रूघ्न दोनो भाई चाहते थे.

   क्रियाकर्म के लिए ब्राम्हण की जरूरत थी. ये बात रावण की  पत्नी मंदोदरी को पता चली. मंदोदरी जिसका नाम सात पतिव्रता स्रियों मे लिया जाता है,जिसका पुण्य  और भगवत भक्ती सिताजी के समान थी. उसने ये कार्य रावण के हातो से कराने की सलाह श्रीराम दी. रावन जैसा भी था लेकिन वो इक दशग्रंथी ब्राम्हण भी था वो ये कार्य कर सकता था. और मंदोदरी ने ये भी सोचा कि श्रीराम को नजदिकी से देख के रावण शायद ये जान जाय की श्रीराम भगवान विष्णू के अवतार है.

   रावन भी अपना ब्राम्हण धर्म निभाने के लिए तैयार हो गया. सबकुछ विधीनुसार हुआ. जब दक्षिणा देने का समय आया तब श्रीराम बोले,'हे रावण तुम्हे दक्षिणा में क्या चाहिए तो रावण ने कहा कि, ' मै लंकाधिपती हूं मेरी लंका सोने की है. सभी देवी देवता मेरे वश मे है. हे राम तुम इक साधारण मानव हो. तुम्हारे पास मुझे देने के क्या है. लेकिन दक्षिणा में मुझे कुछ देना हि चाहते हो तो मुझे सिता दे दो.'
   ये सुनते ही लक्ष्मण,भरत,शत्रूघ्न और सारी वानरसेना क्रोधित हो उठी. लेकिन श्रीराम ने उन्हें रोका और उन्होंने रावण से कहा, 'हे रावण जिस सिता की तुम बात कर रहे हो वो तो पहले  ही तुम ले जा चुके हो. आज तुम्हे देने के लिए मेरे पास सिवाय इस पाणी के कुछ भी नही.' ऐसा कह के वो पाणी से भरा कमंडल रावण के हाथ मे दे देते है. रावण भी बडे अंहकार से वो कमंडल लेके लंका चला जाता है.

   वो लंका जाता है लेकीन राजभवन जाने के बजाय वो अशोक वाटीका मे जाता है जहा सिता माता होती है. वो पाणी से भरा कमंडल जो श्रीराम ने दिया था वो सिता माता को देकर वह कहता है, ' हे सिता देखो तुम्हारे राम ने मुझे दक्षिणा मे क्या दिया है सिर्फ पाणी और फिर भी तुम उस निर्धन की पत्नी बनकर गर्व महसूस करती हो. मुझसे विवाह करो और लंका कि महाराणी बनो.' और रावण वहा चला जाता है. सिता माता सिर्फ हसती है. क्यो कि सिता माता को ही पता था उस कमंडल मे क्या है.

    दरअसल श्रीराम ने अपनी सारे पुण्य उस कमंडल मे डालकर रावण को दिये थे जिसकी वजह से श्रीराम श्रीराम थे. अगर वो पुण्य रावण को मिल जाते तो रावण भी श्रीराम बन सकता था और अगर रावण राम बन जाता तो सिता को पाना उसके लिए सहज संभव था. लेकिन ऐसा हुआ नही क्यो रावण उस  पाणी से भरे कमंडल को पाणी ही समजा था. लेकिन सिता माता जानती थी की उस कमंडल में क्या है इसलिए वो हंस पडी थी.

       हम ही है वो अहंकाररूपी रावण


     हम रोज भगवान से कुछ न कुछ मांगते रहते है लेकिन हमारे रोजमर्रा के जिंदगी ऐसे कितने अवसर आते है जब हमें भगवान बहोत कुछ दे जाते है लेकिन हमे समज मे भी नही आता की हमे क्या मिला है. वो समज ने के लिए पुण्य का होना बहोत जरूरी है और पुण्य तो भगवत भक्ती,सत् विचार, सदाचार और राम नाम में ही है. आज तक ऐसा हुआ नही कि हम भगवान से कुछ मांगे और भगवान हमे ना दे. बस पुण्य का होना बहोत जरूरी है. भगवान जो देते है और जिस रूप मे देते है इसकी पहचान बहोत आवश्यक है. लेकीन हम हमेशा अहंकाररूपी रावण जैसा बर्ताव करते है और इक नारियल तोडकर भगवान को दस इच्छा पुरी करने को बोलते है. नारियल जो कि भगवान ने ही बनाया है. धरती की सारी चिजे तो भगवान ने ही बनाई है. ऐसी कोनसी वस्तु है जो हमारी है और हम भगवान को दे सकते है?.
 
  टिप - इस कहानी को किसी भी धार्मिक ग्रंथ का आधार नही है. इस को सिर्फ जिवनमुल्य के प्रती बोध प्रबोध के नजरिया से देखा जाय.
    जय श्रीराम.
     

Thursday, 25 October 2018

October 25, 2018

क्या #MeToo को रोका जा सकता है? जी हाँ रोका जा सकता है.

     आज कल social media पर #MeToo
की चर्चा बहोत हो रही है. कुछ लोगो के ये मान-मर्यादा, इज्जत और करीअर का सवाल है, तो कुछ लोगो के लिए ये मज्जाक का विषय है. whats up  पर बहोत सारे जोक भी आते है. लेकीन ये विषय बहोत गंभीर है. अगर हम अपना आत्मपरीक्षण ठीक से करले तो शायद ही कोई हो, जो आज की तारीख मे या तो हैरेसमेंट करनेवाला या तो सहनेवाला न हो.


Can we stop #metoo
                             
  
     इस में इक बात अच्छी है की आज की नारी स्वतंत्र और निडर है. अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नही. ये स्त्री-पुरूष समानतायुक्त समाज के निर्माण का संकेत है.
     आज तक नारी ने बहोत कुछ सहा है. एक जमाने मे अगर किसी स्त्री की कोई मांग हो या कोई सलाह हो तो वह सबसे पहले अपनी माॅ से कहती, माॅ उस के पिताजी से कहती फिर बडे ही विचार विमर्श के बाद या तो उसकी मांग स्विकार कर ली जाती या फिर ठुकराई जाती चाहे वो मांग वो सलाह कितनी भी जायज क्यों ना हो. फिर हैरसमेंट जैसी बात तो वो कहने से रही. लेकीन आज का ये जो बदलाव आया है वो प्रशंसनिय है.
     आज बडे बडे नामी लोंगो के नाम इस में लिए जा रहे है इस लिए सारी दुनिया की media मे ये विषय व्हायरल है. नामी लोंगो के नाम आते ही media का भागना स्वभाविक है. लेकीन जो लोग सामान्य है क्या वो हैरसमेंट करते नही या सहते नही?. उन तक कब पहुचेंगी media?. चलो मान लिया #MeToo campaign  जोर से चला और media सामान्य लोंगो तक पहूंच गई तो इतने सारे  cases  चलाने मे कितनी दिक्कत होगी.
      चलो मान लिया #MeToo campaign में बहोत सारे लोगो को सजा मिल गयी. तो ये हैरेसमेंट थोडा कम तो होगा, लेकीन खतम नही होगा, और इसकी भी कोई guarantee नही है, की me too campaign का कोई गलत इस्तेमाल नही कर रहा है.  हो सकता है पुरूष निर्दोश हो और कोई स्त्रि ही उसका शोसन कर रही हो. कल को तो  सब पुरूष इक हो के male me too campaign भी चला सकते है. फिर तो सिर्फ argument होगा,  इसका solution नही निकलेगा. हम यह सब बात करके यहा किसीका इंसाफ नही कर सकते. उसके लिए हमारी न्याय व्यवस्था बहोत सक्षम है और हमारा उस पर विश्वास भी है.
     आज सच में आत्मपरीक्षण की बहोत जरूरत है. हम अपने पिछली पोष्ट विजयदशमि (विजय अपने आप पे) मे विकारों के बारें लिख चूके है. किसी भी इंसान को सजा करने से उसके अंदर के विकारों को सजा नही दी जा सकती. हमारे रोज के व्यवहार मे सत्-विचार,सत्-आचार और सत्-कर्म की बहोत आवश्यक्ता है. हर इंसान को  इसके दायरे मे  रहना ही चाहिए. तो शायद  me too जैसे  campaign  कभी शुरू ही ना हो.
     #MeToo campaign की जड ही है 'काम' विकार जो की अष्टविकारों में सबसे पहले आता है और सब से बलशालि विकार है. ये ना उम्र देखता है,नाही रिश्ते नाते. हम तो फिर भी इंसान है, इसने देवों और बडे बडे ऋषियों मुनियों को भी नही बक्षा.
    इसको कोई भी हो जाती,देश या भाषा  से  फर्क नही पडता. हिंदी मे कहेंगे,'मै आप से प्यार करता हूं'. मराठी मे बोलेंगे,'मी तुमच्यावर प्रेम करतो.' गुजराती में बोलेंगे,' मै तने प्रेम करे छू'. बंगाली में बोलेंगे,'आमी तुमा के भालो बाशी ". पंजाबी में बोलेंगे,"मै तन्ने  प्यार करना."और बाहर के देशों में कहेगे,'I love you'.लेकिन इसका प्रकोप सभी पे समान पड़ता है.
     प्यार,प्रेम गलत नही है. भगवान ने स्त्री और पुरूष के बिच प्यार इसलिए बनाया ताकी एकत्रित परिवार और समाज व्यवस्था बनी रहे. प्रजनन हेतू काम विकार निर्माण किया गया. हम अग्नि, ब्राम्हण और रिश्तेदारों को साक्षी मानकर जिसके साथ विवाह बंधन मे बँध जाते है, वही पति-पत्नी  इसके हकदार है. लेकीन लोगो ने इसका (कामविकार का ) गलत उपयोग किया. सच्चा प्यार भगवान से बढकर है. इक सच्चा प्यार किसी भी इंसान की जिंदगी बदल सकता है, उसे ज़मीन से आसमान बना सकता है. लेकीन काम विकारयुक्त प्यार, सच्चे प्यार को बदनाम कर देता है.
    सिर्फ इक दिन हम अपने आजू बाजू की परिस्थिती का निरीक्षण करे. दो लोग office में काम कर रहे होते है, तो उनकी वार्तालाप यही होती है की,'यार बाॅस की नई सेक्रेटरी क्या आयटम है.' जब दो-चार लोग पार्टी कर रहे होते है तो एक दुसरे से पूछते है,' यार कोई नया नंबर है क्या ?' या फिर 'यार मार्केट मे कोई नया माल आया है क्या'.जब की वो सब शादीशुदा और बाल बच्चेवाले पढे-लिखे लोग होते है.
     हम बडे सहज भाव से ये विचार बोल देते है,कर लेते है लेकिन हमे अंदाजा भी नही होता की ये विचार आगे हमे किस भयानक दुष्कर्म की अंधेरी  खाई मे ले जा रहा है. विकार अकेले नही आते. काम के साथ क्रोध, चिंता डर लालच आदी दुसरे  विकार भी आते है, ये इक दुसरे से संलग्न होते है. फिर हत्या जैसे बडे गुनाह भी होते है. इंसान का अपने मन पर काबू नही रहता, वो क्या करता है उसे समज मे नही आता और जब समज आता है तब तक बहोत देर हो जाती है. सब कुछ हात से निकल जाता है. तब पश्चाताप के सिवा और किए हुए गुनाह की सजा पाने के सिवा उसके  हात मे कुछ नही रह पाता.
     इन विकारों पर हम जितनी भी बात करे, समय और शब्द कम पड जायेंगे. हम भगवान श्रीराम,श्रीकृष्ण तथा रामायण, महाभारत के बारे में सब जानते है. उन के उपदेश को भी जानते है. लेकीन कितने लोग है,जो अपने रोज के व्यवहारों मे उनका अनुकरण करते है, उन के विचारों पे चलते है. हम रोज भजन,किर्तन और प्रवचन सुनते है, सिर्फ सुनते है उन्हे आत्मसात (आत्मसाथ - अंतर आत्मा के साथ) नही करते. भारत देश के भूमी मे बडे बडे महात्मे, ज्ञानी पंडीत और संत लोगों ने जन्म लिया और सत्-विचारों का खजाना छोड गये. जिसमे एक विचार मोती  ये है की, पराई स्त्री माँ समान होती है.  लेकिन हम भौतिक और क्षणिक  सुख की लालच मे इतने अंधे हो गए है की इस खजाने की तरफ किसी का ध्यान ही नही जाता. 
     ये अष्टविकार ही है, जो #MeToo जैसे घ्रृणास्पद कृत्य की जड है. हम अपने रोज के व्यवहार मे सत्-विचार, सत्-कर्म, और सत्-आचरण अपना ले तो किसी को भी #MeToo जैसे campaign चलाने की नौबत नही आएगी और किसी को भी  शर्मिंदा नही होना पड़ेगा.