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Tuesday, 8 October 2019

October 08, 2019

विजयादशमी संकल्प - अध्यत्मता से अवगुणों का त्याग

 अध्यत्मता हमारी सभी धर्म और जाती की आत्मा है.हिंदू धर्म में तो अध्यम को अनन्य साधारण महत्व है. अध्यत्मता अवगुणों त्याग किया जा सकता है. किसी भी ग्रंथ मे जो बाते लिखी होती है,बताई गई होती है वह हमारे पूरे जिवनकाल मे किसी भी मसले मे बहोत महत्वपूर्ण साबित होती है.
  पिछले साल मैने विजयादशमी ( दश इंद्रियों पर विजय पाना) ये पोष्ट लिखी थी.जिस मे मैने लिखा था कैसे हम एक क्षण मे राम है तो दुसरे क्षण मे रावण है.अपनी बुरी आदतें और बुरे विचारों के बारे मे लिखा था.
  आज मै आपको महाभारत के दो कथाऐ बताऊंगा जो कि आप भलेभांती जानते हो.वैसे महाभारत बहोत सारी कथाओं का गुलदस्ता है और हर एक कथा अपने आप मे श्रेष्ठ है.हर कथा हमारे जिवन को प्रभावित करती है,हमे बुरे कर्मो से,बुरे विचारों से लढने का तरीका बताती है.
                                                                         
 Vijayadashmi Sankalp adhyatmata se avagun tyag.
जरासंध वध - हम सभी ये कथा जानते है की भीम ने जरासंध का वध कर रहा था तो वो वापस जुड जाता था. वो मर ही नही रहा था. तभी भीम श्रीकृष्ण की और देखते है,श्रीकृष्ण इशारा करते है की जरासंध को चिरकर अलग दिशा मे फेंके. भीम वही करते है और इस तरह जरासंध की मृत्यु हो जाती है.
   अब ये कथा हमारे जिवन मे कैसे प्रभाव डालती है ये देखते है.मान लो किसी को शराब पिने की आदत है उस शराब की वजह से वो कर्जे मे डूब जाता है, घर परीवार बिखर जाता है, लफडे झगडे होते है वो अलग इक समय आता है जब उस इंसान को ये समज आता है की ये सब शराब की वजह से होता है. वो ठाण भी लेता है की कल से वो शराब नही पियेगा. वो कसम भी खाता है की वो कल से शराब नही पियेगा. लेकिन उसकी ये कसम बस इक दो दिन ज्यादा से ज्यादा इक महिना चलती है बाद मे इक दिन  पी ही लेता है.तो समजो बुरी विचारोंवाला जरासंध फिर से जुड गया.
  इसी तरह तंबाखू गुटका खानेवाले,चोरी करनेवाले,औरतबाजी करनेवाले लोग,किसी की घृणा करनेवाले लोग कोई भी बुरी आदत रखनेवाले लोग सब की सभी की यही दशा होती है. बुरी विचारों और बुरी आदतोंवाला जरासंध फिर से जुड जाता है.
  अब इसके लिए उपाय क्या है? तो उपाय है. श्रीकृष्ण ने भीम को जरासंध को चिरकर विरोधी दिशा मे डालने को कहा था. हमे भी यही करना है. उल्टा ही करना है.यहा हम शराबी का उदाहरण लेते है.शराब लेनी की पॅक बनाने का इक बार उसे देखकर उसे बिना पिये फेंक देने की.थोडे दिन बहोत कठिण होगा करने मे पर धिरे धिरे हो जायेगा और इस तरह आदमी की शराब कि बुरी लत छुट जायेगी.ये दिखता है उतना आसान नही है, आखिरकार आप स्वयं भीम बनकर जरासंध का वध कर रहे हो. मन को कठोर बनाकर आप को ये करना पडेगा.इसी तरह गुटखा फोडने का लेकिन खाने का नही,फेकने का.इसी थीअरी प्रयोग आप हर बुरी लत के लिए कर सकते हो.
  कहानी यही खतम नही होती. जरासंध ( अपनी बुरी आदतें ) फिर से जुड जाती है. कैसे? इसके लिए मै और इक कहानी सुनाता हूं.
 राजा परिक्षित की कहानी.
 राजा परिक्षित की कहानी तो आप सभी जानते हो. राजा परिक्षित पांडवो के वंशज थे.राजा बहोत ही सुस्वभावी तथा शालीन  तथा अध्यत्मिक व्यक्ती थे.अपने प्रजा का बहोत खयाल रखते थे.इक दिन उन्होंने अपने पूर्वज पांडवो के बनाये तहखाना खोलने का निश्चय किया जो की सालो से बंद था जहा पर युद्ध मे उपयोग हुए औजार तथा मृत और घायल व्यक्ती की चिजे रखी थी.जहा पे उन्हे इक मुकूट बहोत पसंद आया वो पहनकर वो जंगल मे शिकार करने निकल गये.जहा उन्हे कुछ ऋषी मुनी तप करते हुए नजर आये.राजा परिक्षित को प्यास लगी थी सो उन्होंने उन ऋषीयों के पास पाणी मांगा.लेकिन तप मे लिन वो ऋषी राजा की बात सुन न पाये सो राजा को गुस्सा आया राजा ने इक मरा हुआ साप ऋषी के गले मे डालकर वहा से चल दिए. जब ऋषी तप मे से जागे उन्होंने अंतरज्ञान से जान लिया की ये किसने किया ऋषी ने श्राप दे दिया की जिसने भी ये किया है,उसकी सात दिन मे साप काटकर मृत्यू होगी और इसी प्रकार राजा की मृत्यू हो गयी. ये कहानी हम सब जानते है.
  राजा परिक्षित एक अच्छे मन के व्यक्ती थे.तो उन्होंने ऐसा दुष्कर्म कैसे किया? क्यों की उन्होंने जो मुकूट पहना था वो जरासंध का था, जरासंध था ही कुविचारी.जैसे ही उन्होंने वो मुकूट पहना जरासंध के कुविचार राजा के दिमाग मे आ गये.जैसे ही राजा ने वो मुकूट उतारा उनको अपने कर्म पर बहोत पश्चाताप हुआ.ये भी एक निती थी क्यों की उस वक्त द्वापारयुग खत्म हो के कलीयुग का प्रारंभ था. कली का प्रवेश कणक से होनेवाला तो हो गया.
 ऐसा हमारे निजी जिवन मे भी होता है.कई बार हम शराब पिने की बुरी आदत छोड देते है.लेकिन तभी हमे कोई पुराना दोस्त मिल जाता है,वो हमे पिने के लिए जबरदस्ती करता है.उसका दिल रखने के लिए हम इक बार पी भी लेते है.लेकिन वो लत बाद मे हमे चिपक जाती है. तब समज लेना वो आपका दोस्त आपको जरासंध का मुकूट पहनाने आया है.इस तरह छुटी हुई गलत आदते आपको किसी ना किसी तरह चिपक जाती है.
  हिंदू धर्म के ग्रंथ बुरी आदतो से छुटकारा पाने का तथा अच्छे कर्म करने सटीक मार्ग बताते है,जिवन का सार बताते है.बस  सही मतलब समज मे आना चाहिए.
  लेकिन आज भौतिक सुखों के पिछे भागकर इंसान खुद अपनी अधोगती का मार्ग चुनता है. हम हमेशा सुनते रहते है यहा खून, वहा आत्महत्या, यहा डाका, वहा बलात्कार ये सब हमारे धर्मग्रंथों के गलत मतलब निकालने का नतिजा है.
  जब मै यह पोष्ट लिख रहा था तब what's up पे मुझे एक मेसेज आया वो इस प्रकार था.
    गिता अध्याय  9 श्लोक नं. 20.
   त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा
   यज्ञरिष्ट् वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
   ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकम
अश्नान्ती दिव्यान्दिवि देवभोगन्।
 और निचे लिखा था की, देखो सोमरस ( दारू ) पिने से इंसान को स्वर्ग की प्राप्ती होती है.
  अब इंसान को क्या बोले? इंसान अपने मतलब का अर्थ बराबर निकाल लेता है वो भी भगवत गिता जैसे महान ग्रंथ से जो की वेदों का सार है.इसलिए तो इसान का पतन होता है.
  उस श्लोक का अर्थ है, जो लोग सकाम कर्म करते है, सोमरस का पान करते है,वो पापों से शुद्ध होकर यज्ञ करके मेरी पूजा करते है वो स्वर्ग की प्राप्ती कर के देवलोक के सुख प्राप्त करते है.
  यहा सोमरस का अर्थ है, सोम याने इश्वर और रस याने भक्ती.सोमरस याने इश्वरभक्ती. लोग सोमरस को दारू समजते है.
  satvichar.com का हमेशा अच्छे विचार लोगो तक पहूंचाने का प्रयास करता है, इसलिए वाचकों की आशिर्वाद की जरूरत है. गलती हम से भी हो सकती है. अगर कोई गलती हो जाय हमे क्षमा करे और अपने सुझाव भेजे.
  धन्यवाद.
Satvichar.com की तरफ से सभी वाचको को विजयादशमी ( दशहरा ) की हार्दिक शुभकामनाए.

Friday, 25 January 2019

January 25, 2019

Ramayana Story- Untold Story Of Ramayana For Life Changing


  हमारे धर्मग्रंथ Ramayana Story अपनी रोज के व्यवहारों के लिए बहोत ही मार्गदर्शक है. जो हमें जिवनमुल्य सिखाते है तथा अपने आचरण एवं विचारों को शुद्ध बनाते है. इस पोष्ट से हम इन्ही सब बातो का विवरण करेंगे. आज हम ऐसी ही इक Ramayana Story जानेंगे जो शायद आपने कभी पढी नही होगी.
    
   कोई भी चिज पाने के लिए पुण्य का होना जरूरी है. और पुण्य पाने के लिए सत् कर्म, सत् भगवत भक्ती और सत् विचारों की आवशक्ता है.
 Ramayana Story- Untold Story Of Ramayana For Life Changing

Ramayana Story - पुण्य का महत्व.


रावण सिताजी  को हमेशा पाना चाहता था. लेकिन रावण के उतने पुण्य नही थे कि वो सिताजी को पा सके. रावण बहोत शक्तीशाली तथा धनवान था. लेकिन पुण्य उसके पास बिलकुल भी नही था. लेकिन श्रीराम खुद पुण्य स्वरूप थे. जिनको देखने से ही पुण्य मिलता था. सिताजी भी श्रीराम कि भक्त थी.

    जब श्रीराम सिताजी को लाने अपने वानरसेना के साथ लंका गये. तो श्रीराम और रावन के बिच युद्ध चल रहा था. इधर आयोध्या में श्रीराम के वियोग से उनके पिता राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिये थे. क्रियाकर्म और अस्थी विसर्जन का कार्य सबसे बडे बेटे होने के कारण श्रीराम करे  ऐसे भरत और शत्रूघ्न दोनो भाई चाहते थे.

   क्रियाकर्म के लिए ब्राम्हण की जरूरत थी. ये बात रावण की  पत्नी मंदोदरी को पता चली. मंदोदरी जिसका नाम सात पतिव्रता स्रियों मे लिया जाता है,जिसका पुण्य  और भगवत भक्ती सिताजी के समान थी. उसने ये कार्य रावण के हातो से कराने की सलाह श्रीराम दी. रावन जैसा भी था लेकिन वो इक दशग्रंथी ब्राम्हण भी था वो ये कार्य कर सकता था. और मंदोदरी ने ये भी सोचा कि श्रीराम को नजदिकी से देख के रावण शायद ये जान जाय की श्रीराम भगवान विष्णू के अवतार है.

   रावन भी अपना ब्राम्हण धर्म निभाने के लिए तैयार हो गया. सबकुछ विधीनुसार हुआ. जब दक्षिणा देने का समय आया तब श्रीराम बोले,'हे रावण तुम्हे दक्षिणा में क्या चाहिए तो रावण ने कहा कि, ' मै लंकाधिपती हूं मेरी लंका सोने की है. सभी देवी देवता मेरे वश मे है. हे राम तुम इक साधारण मानव हो. तुम्हारे पास मुझे देने के क्या है. लेकिन दक्षिणा में मुझे कुछ देना हि चाहते हो तो मुझे सिता दे दो.'
   ये सुनते ही लक्ष्मण,भरत,शत्रूघ्न और सारी वानरसेना क्रोधित हो उठी. लेकिन श्रीराम ने उन्हें रोका और उन्होंने रावण से कहा, 'हे रावण जिस सिता की तुम बात कर रहे हो वो तो पहले  ही तुम ले जा चुके हो. आज तुम्हे देने के लिए मेरे पास सिवाय इस पाणी के कुछ भी नही.' ऐसा कह के वो पाणी से भरा कमंडल रावण के हाथ मे दे देते है. रावण भी बडे अंहकार से वो कमंडल लेके लंका चला जाता है.

   वो लंका जाता है लेकीन राजभवन जाने के बजाय वो अशोक वाटीका मे जाता है जहा सिता माता होती है. वो पाणी से भरा कमंडल जो श्रीराम ने दिया था वो सिता माता को देकर वह कहता है, ' हे सिता देखो तुम्हारे राम ने मुझे दक्षिणा मे क्या दिया है सिर्फ पाणी और फिर भी तुम उस निर्धन की पत्नी बनकर गर्व महसूस करती हो. मुझसे विवाह करो और लंका कि महाराणी बनो.' और रावण वहा चला जाता है. सिता माता सिर्फ हसती है. क्यो कि सिता माता को ही पता था उस कमंडल मे क्या है.

    दरअसल श्रीराम ने अपनी सारे पुण्य उस कमंडल मे डालकर रावण को दिये थे जिसकी वजह से श्रीराम श्रीराम थे. अगर वो पुण्य रावण को मिल जाते तो रावण भी श्रीराम बन सकता था और अगर रावण राम बन जाता तो सिता को पाना उसके लिए सहज संभव था. लेकिन ऐसा हुआ नही क्यो रावण उस  पाणी से भरे कमंडल को पाणी ही समजा था. लेकिन सिता माता जानती थी की उस कमंडल में क्या है इसलिए वो हंस पडी थी.

       हम ही है वो अहंकाररूपी रावण


     हम रोज भगवान से कुछ न कुछ मांगते रहते है लेकिन हमारे रोजमर्रा के जिंदगी ऐसे कितने अवसर आते है जब हमें भगवान बहोत कुछ दे जाते है लेकिन हमे समज मे भी नही आता की हमे क्या मिला है. वो समज ने के लिए पुण्य का होना बहोत जरूरी है और पुण्य तो भगवत भक्ती,सत् विचार, सदाचार और राम नाम में ही है. आज तक ऐसा हुआ नही कि हम भगवान से कुछ मांगे और भगवान हमे ना दे. बस पुण्य का होना बहोत जरूरी है. भगवान जो देते है और जिस रूप मे देते है इसकी पहचान बहोत आवश्यक है. लेकीन हम हमेशा अहंकाररूपी रावण जैसा बर्ताव करते है और इक नारियल तोडकर भगवान को दस इच्छा पुरी करने को बोलते है. नारियल जो कि भगवान ने ही बनाया है. धरती की सारी चिजे तो भगवान ने ही बनाई है. ऐसी कोनसी वस्तु है जो हमारी है और हम भगवान को दे सकते है?.
 
  टिप - इस कहानी को किसी भी धार्मिक ग्रंथ का आधार नही है. इस को सिर्फ जिवनमुल्य के प्रती बोध प्रबोध के नजरिया से देखा जाय.
    जय श्रीराम.
     

Thursday, 25 October 2018

October 25, 2018

क्या #MeToo को रोका जा सकता है? जी हाँ रोका जा सकता है.

     आज कल social media पर #MeToo
की चर्चा बहोत हो रही है. कुछ लोगो के ये मान-मर्यादा, इज्जत और करीअर का सवाल है, तो कुछ लोगो के लिए ये मज्जाक का विषय है. whats up  पर बहोत सारे जोक भी आते है. लेकीन ये विषय बहोत गंभीर है. अगर हम अपना आत्मपरीक्षण ठीक से करले तो शायद ही कोई हो, जो आज की तारीख मे या तो हैरेसमेंट करनेवाला या तो सहनेवाला न हो.


Can we stop #metoo
                             
  
     इस में इक बात अच्छी है की आज की नारी स्वतंत्र और निडर है. अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नही. ये स्त्री-पुरूष समानतायुक्त समाज के निर्माण का संकेत है.
     आज तक नारी ने बहोत कुछ सहा है. एक जमाने मे अगर किसी स्त्री की कोई मांग हो या कोई सलाह हो तो वह सबसे पहले अपनी माॅ से कहती, माॅ उस के पिताजी से कहती फिर बडे ही विचार विमर्श के बाद या तो उसकी मांग स्विकार कर ली जाती या फिर ठुकराई जाती चाहे वो मांग वो सलाह कितनी भी जायज क्यों ना हो. फिर हैरसमेंट जैसी बात तो वो कहने से रही. लेकीन आज का ये जो बदलाव आया है वो प्रशंसनिय है.
     आज बडे बडे नामी लोंगो के नाम इस में लिए जा रहे है इस लिए सारी दुनिया की media मे ये विषय व्हायरल है. नामी लोंगो के नाम आते ही media का भागना स्वभाविक है. लेकीन जो लोग सामान्य है क्या वो हैरसमेंट करते नही या सहते नही?. उन तक कब पहुचेंगी media?. चलो मान लिया #MeToo campaign  जोर से चला और media सामान्य लोंगो तक पहूंच गई तो इतने सारे  cases  चलाने मे कितनी दिक्कत होगी.
      चलो मान लिया #MeToo campaign में बहोत सारे लोगो को सजा मिल गयी. तो ये हैरेसमेंट थोडा कम तो होगा, लेकीन खतम नही होगा, और इसकी भी कोई guarantee नही है, की me too campaign का कोई गलत इस्तेमाल नही कर रहा है.  हो सकता है पुरूष निर्दोश हो और कोई स्त्रि ही उसका शोसन कर रही हो. कल को तो  सब पुरूष इक हो के male me too campaign भी चला सकते है. फिर तो सिर्फ argument होगा,  इसका solution नही निकलेगा. हम यह सब बात करके यहा किसीका इंसाफ नही कर सकते. उसके लिए हमारी न्याय व्यवस्था बहोत सक्षम है और हमारा उस पर विश्वास भी है.
     आज सच में आत्मपरीक्षण की बहोत जरूरत है. हम अपने पिछली पोष्ट विजयदशमि (विजय अपने आप पे) मे विकारों के बारें लिख चूके है. किसी भी इंसान को सजा करने से उसके अंदर के विकारों को सजा नही दी जा सकती. हमारे रोज के व्यवहार मे सत्-विचार,सत्-आचार और सत्-कर्म की बहोत आवश्यक्ता है. हर इंसान को  इसके दायरे मे  रहना ही चाहिए. तो शायद  me too जैसे  campaign  कभी शुरू ही ना हो.
     #MeToo campaign की जड ही है 'काम' विकार जो की अष्टविकारों में सबसे पहले आता है और सब से बलशालि विकार है. ये ना उम्र देखता है,नाही रिश्ते नाते. हम तो फिर भी इंसान है, इसने देवों और बडे बडे ऋषियों मुनियों को भी नही बक्षा.
    इसको कोई भी हो जाती,देश या भाषा  से  फर्क नही पडता. हिंदी मे कहेंगे,'मै आप से प्यार करता हूं'. मराठी मे बोलेंगे,'मी तुमच्यावर प्रेम करतो.' गुजराती में बोलेंगे,' मै तने प्रेम करे छू'. बंगाली में बोलेंगे,'आमी तुमा के भालो बाशी ". पंजाबी में बोलेंगे,"मै तन्ने  प्यार करना."और बाहर के देशों में कहेगे,'I love you'.लेकिन इसका प्रकोप सभी पे समान पड़ता है.
     प्यार,प्रेम गलत नही है. भगवान ने स्त्री और पुरूष के बिच प्यार इसलिए बनाया ताकी एकत्रित परिवार और समाज व्यवस्था बनी रहे. प्रजनन हेतू काम विकार निर्माण किया गया. हम अग्नि, ब्राम्हण और रिश्तेदारों को साक्षी मानकर जिसके साथ विवाह बंधन मे बँध जाते है, वही पति-पत्नी  इसके हकदार है. लेकीन लोगो ने इसका (कामविकार का ) गलत उपयोग किया. सच्चा प्यार भगवान से बढकर है. इक सच्चा प्यार किसी भी इंसान की जिंदगी बदल सकता है, उसे ज़मीन से आसमान बना सकता है. लेकीन काम विकारयुक्त प्यार, सच्चे प्यार को बदनाम कर देता है.
    सिर्फ इक दिन हम अपने आजू बाजू की परिस्थिती का निरीक्षण करे. दो लोग office में काम कर रहे होते है, तो उनकी वार्तालाप यही होती है की,'यार बाॅस की नई सेक्रेटरी क्या आयटम है.' जब दो-चार लोग पार्टी कर रहे होते है तो एक दुसरे से पूछते है,' यार कोई नया नंबर है क्या ?' या फिर 'यार मार्केट मे कोई नया माल आया है क्या'.जब की वो सब शादीशुदा और बाल बच्चेवाले पढे-लिखे लोग होते है.
     हम बडे सहज भाव से ये विचार बोल देते है,कर लेते है लेकिन हमे अंदाजा भी नही होता की ये विचार आगे हमे किस भयानक दुष्कर्म की अंधेरी  खाई मे ले जा रहा है. विकार अकेले नही आते. काम के साथ क्रोध, चिंता डर लालच आदी दुसरे  विकार भी आते है, ये इक दुसरे से संलग्न होते है. फिर हत्या जैसे बडे गुनाह भी होते है. इंसान का अपने मन पर काबू नही रहता, वो क्या करता है उसे समज मे नही आता और जब समज आता है तब तक बहोत देर हो जाती है. सब कुछ हात से निकल जाता है. तब पश्चाताप के सिवा और किए हुए गुनाह की सजा पाने के सिवा उसके  हात मे कुछ नही रह पाता.
     इन विकारों पर हम जितनी भी बात करे, समय और शब्द कम पड जायेंगे. हम भगवान श्रीराम,श्रीकृष्ण तथा रामायण, महाभारत के बारे में सब जानते है. उन के उपदेश को भी जानते है. लेकीन कितने लोग है,जो अपने रोज के व्यवहारों मे उनका अनुकरण करते है, उन के विचारों पे चलते है. हम रोज भजन,किर्तन और प्रवचन सुनते है, सिर्फ सुनते है उन्हे आत्मसात (आत्मसाथ - अंतर आत्मा के साथ) नही करते. भारत देश के भूमी मे बडे बडे महात्मे, ज्ञानी पंडीत और संत लोगों ने जन्म लिया और सत्-विचारों का खजाना छोड गये. जिसमे एक विचार मोती  ये है की, पराई स्त्री माँ समान होती है.  लेकिन हम भौतिक और क्षणिक  सुख की लालच मे इतने अंधे हो गए है की इस खजाने की तरफ किसी का ध्यान ही नही जाता. 
     ये अष्टविकार ही है, जो #MeToo जैसे घ्रृणास्पद कृत्य की जड है. हम अपने रोज के व्यवहार मे सत्-विचार, सत्-कर्म, और सत्-आचरण अपना ले तो किसी को भी #MeToo जैसे campaign चलाने की नौबत नही आएगी और किसी को भी  शर्मिंदा नही होना पड़ेगा.

Thursday, 18 October 2018

October 18, 2018

दशहरा( विजयदशमी ) विजय अपने आप पे

       

        दशहरा  (विजयादशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया . इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता . इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है. (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि). दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है. इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं. (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि).इस दिन लोग नया घर खरीदना, नई गाड़ी लेना,सोना ओर जेवर खरीदना ये सब शुभ मानते है. ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती . प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रणयात्रा के लिए प्रस्थान करते थे. कहते है इसी दिन पांडवोंने अपने शस्त्र जो की शमी के वृक्ष पर छिपाए थे बनवास के दौरान, उन्हे निकालकर उनकी पूजा की थी इसलिए भी आयुध-पूजा करते है. सारांश ये है की विजयादशमी एक विजय दिवस है इस दिन शुरू किए कार्य मे सफलता ज़रूर मिलती है.
                                         
dussera vijayadashami victory on myself

        दशहरा (विजयदशमी )याने विजय अपने आप पे
          
        विजयादशमी   याने विजय पाना है अपने दश इन्द्रियो पर. इंसान का शरीर दश इंद्रियो से बना है, अगर हर इंसान अपने इन दश इंद्रियो पे काबू पा लेगा तो एक सतचरित्रवान इंसान पैदा होगा. ऐसे इंसान से एक घर, घर से एक गाव,गाव से जिला,जिले से स्टेट,स्टेट से देश ही सत् विचारक और सतचरित्रवान बन जाएगा. और satvichar.com का ये सपना है की सारी दुनिया सत् विचारक और  सतचरित्रवान बन जाए.

       हमारे इंद्रियो का खेल भी देखो सुबह हमारे पैर office निकलते है, शाम को वही पैर beer baar जाते है. office जाते वक्त रास्ते मे मिले भिकारी को हमारे हात दस रुपये देते है,शाम को उसी beer baar मे किसी अंजाने को हमारे हात दो थप्पड़ देते है. office में दिन भर laptop पे हमारी आँखे excel sheet बनाती है, उसी वक्त बाजू की टेबल पर बैठी महिला सहकारीको बुरी नज़रसे भी देखती है. सुबह हमारे कान भजन भक्ति संगीत सुनते है,वही कल किसी का कुछ बुरा हुआ तो आज उसका क्या हाल है, ये सुनने के लिए भी कान तरसते है. दूसरे लोगो के दुख मे हमे खुशी मिलती है. सुबह हम किसी को Good Morning बोलते है तो शाम को किसी को गन्धि गन्धि गलिया देते है. कभी कभी हम कल के सुनहरे सपने देखते है तो दूसरे क्षण किसी चिंता के कारण मन मे आत्महत्या के विचार भी आते है.

        तो देखो हम एक क्षण अच्छा काम करते है तो दूसरे क्षण बुरा काम करते है. अच्छा और बुरा दोनो विरोधी काम करने के लिए हम एक ही इंद्रिय का इस्तेमाल करते है. इन इंद्रियो पर विजय पाना ही सही विजयदशमी ( दशहरा- दस इद्रीयों हरा देना उनको काबू में कर  लेना ) है. हमेशा अच्छा काम करना अच्छा विचार करना ही इन इंद्रियो पे विजय पाना है. काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर शक ओर चिंता इन विकारो का त्याग करना ही विजयदशमी है. सारे बुरे काम इन विकारो के कारण ही होते है. इसलिए इन्हे इस विजयादशमी के शुभ अवसर पर त्यागना है.

      इन इंद्रियो पे विजय पाना आसान नही है. इसलिए भगवान की भक्ति की ज़रूरत है. ये भगवत भक्तीरूपी दुर्गा देवी माॅ ही इस महिषासुर ( अष्ट-विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर शक ओर चिंता ) का नाश करेगी.
      
      भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था. आज के इस कलयुग मे राम भी हम है ओर रावन भी हम ही है. हमारे विचार जब अच्छे हो हम राम है, हमारे विचार जब गलत हो तब हम ही रावण है. इसलिए आज अपने अच्छे विचारों ( राम ) से बुरे विकारों का ( रावण ) वध कर दो, तो सच में रावण का वध हो जायेगा.
        
       विजयादशमी  याने के दशहरे के दिन आयुध पूजा या शस्त्र-पूजा करते है. क्यों की उसी शस्त्र से हम अपने शत्रू पर विजय प्राप्त कर सके. इस कलयुग मे ना हमारे पास कोई शस्त्र है ना हमे कोई शत्रू दिखाई पडता है.लेकीन इस कलयुग मे अब हमारे इंद्रीय ही हमारे शस्त्र है और ये अष्टविकार ही हमारे शत्रू है. हमें इन इंद्रियरूपी शस्त्रों से अष्टविकाररूपी शत्रू पर विजय प्राप्त करनी है.

        कोई भी धर्म या धर्मग्रंथ की सिक तो मानवता ही होती है. सत् विचार  ,सत् आचार और सत् कर्म ही मानवता के प्रमुख सूत्र है. जिस दिन हम अपने दशइंद्रीयों पर विजय पायेंगे ये चिजे हम मे अपने आप आ जायेंगी और मानवता धर्म आपने आप फलने फुलने लगेगा और सारी दुनिया सुख शांती से भर जायेगी. उस दिन सही मायने मे विजयादशमी(दस इंद्रीयों पर विजय) मनाई जायेगी.
         
       आज दुनिया में इतना अज्ञान भरा पडा है की लोग धर्म और अधर्म के पथ को पहचान ही नही पाते. इसलिए अधिकांश लोग अधर्म की पथ पर चल पडते है.
         
        हम कोई ज्ञानी पंडित तो है नहि. रोज-मर्रा की जिंदगी से जो सीखते है, अनुभव करते है, देखते है उसी को विचार के रूप मे प्रगट करते है. इस मे कुछ ग़लती हो जाए तो क्षमा कीजिए.
           
          आप सभी को दशहरा और विजयादशमी की हार्दीक शुभकामनाऐं.